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खून से जुड़ी बीमारियों के इलाज में देरी खतरनाक हो सकता है: हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर से कब सलाह लेना चाहिए डॉ. शैलेश बांबोर्डे, एसोसिएट डायरेक्टर – हेमेटोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट, मैक्स सुपर स्पेशियल


जबलपूर। डॉ. शैलेश बांबोर्डे, एसोसिएट डायरेक्टर – हेमेटोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट,मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नागपुर के मुताबिक, खून से जुड़ी बीमारियां अक्सर धीरे-धीरे बढ़ती हैं और शुरुआत में इनके ज्यादा साफ लक्षण दिखाई नहीं देते। इनके संकेत जैसे थकान, कमजोरी या बार-बार इंफेक्शन होना, आम समस्याओं जैसे ही लगते हैं। इसी वजह से कई लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं और डॉक्टर के पास जाने में देर कर देते हैं। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें या आपको कुछ अलग महसूस हो, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह किसी गंभीर खून की बीमारी का संकेत हो सकता है। ऐसे में खून के रोगों के विशेषज्ञ (हेमेटोलॉजिस्ट) डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर जांच और सही इलाज से बीमारी का जल्दी पता चल सकता है और आगे होने वाली गंभीर परेशानियों से बचा जा सकता है।


ऐसे सामान्य लक्षण जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए

कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जो खून से जुड़ी बीमारियों का संकेत दे सकते हैं, इसलिए इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर पर्याप्त आराम करने के बाद भी लगातार थकान या कमजोरी महसूस होती है, बिना कारण शरीर पर नीले निशान (चोट के दाग) पड़ते हैं, या नाक और मसूड़ों से बार-बार खून आता है, तो ये चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। बार-बार संक्रमण होना या घाव भरने में ज्यादा समय लगना भी खून से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है। इसके अलावा त्वचा का पीला या फीका पड़ना, शरीर में गांठ (लिम्फ नोड्स) आना, बिना वजह वजन कम होना या बार-बार बुखार आना भी ध्यान देने वाली बातें हैं। अगर ब्लड टेस्ट में कोई गड़बड़ी दिखे, तो उसे भी गंभीरता से लेना चाहिए। शुरुआत में ये लक्षण सामान्य लग सकते हैं, लेकिन अगर ये लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

खून से जुड़ी बीमारियों की गंभीर स्थितियां

कुछ मामलों में तुरंत हेमेटोलॉजिस्ट से संपर्क करना बहुत जरूरी होता है। जैसे अगर खून की कमी (एनीमिया) का इलाज कराने के बाद भी सुधार नहीं हो रहा हो, या सीबीसी टेस्ट में हीमोग्लोबिन, सफेद खून की कोशिकाएं या प्लेटलेट्स बहुत ज्यादा या बहुत कम हों, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर ल्यूकेमिया, लिम्फोमा या मायलोमा जैसे खून के कैंसर का शक हो, तो तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच और इलाज शुरू कराना जरूरी है। इसके अलावा अगर खून ज्यादा जमने लगे या ज्यादा बहने लगे (जैसे डीवीटी), बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़े, या तिल्ली (स्प्लीन) और शरीर की गांठें (लिम्फ नोड्स) बिना कारण बढ़ जाएं, तो ये भी गंभीर संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में देर न करें और तुरंत सही जांच व इलाज कराएं, ताकि आगे की परेशानी से बचा जा सके।

जल्दी पहचान (निदान) का महत्व

कई खून से जुड़ी बीमारियां, जिनमें कुछ प्रकार के कैंसर भी शामिल हैं, अगर समय पर पता चल जाएं तो उनका इलाज प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। लेकिन अगर जांच कराने या डॉक्टर के पास जाने में देरी होती है, तो बीमारी बढ़ सकती है। इससे इलाज करना मुश्किल हो जाता है और ठीक होने की संभावना भी कम हो जाती है। शुरुआत में इनके लक्षण बहुत हल्के होते हैं और आसानी से नजर नहीं आते। लेकिन एक साधारण ब्लड टेस्ट से शरीर की छिपी हुई समस्या का पता लगाया जा सकता है। इसलिए समय पर हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है, ताकि सही जांच और इलाज जल्दी शुरू किया जा सके।

बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसे उन्नत इलाज के विकल्प

मेडिकल क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण अब खून से जुड़ी बीमारियों का इलाज पहले से ज्यादा असरदार हो गया है। कुछ गंभीर मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) जीवन बचाने वाला इलाज साबित हो सकता है। एलोजेनिक ट्रांसप्लांट में किसी डोनर से बोन मैरो लिया जाता है। इसका इस्तेमाल थैलेसीमिया, ल्यूकेमिया और एप्लास्टिक एनीमिया जैसी बीमारियों के इलाज में किया जाता है। वहीं ऑटोलॉगस ट्रांसप्लांट में मरीज की अपनी ही कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है। यह आमतौर पर मल्टीपल मायलोमा, लिम्फोमा और कुछ अन्य ट्यूमर के इलाज में किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया काफी जटिल होती है, इसलिए इसे सिर्फ विशेष अस्पतालों में और अनुभवी डॉक्टरों की निगरानी में ही किया जाता है।

उन्नत इलाज से बड़ा फर्क पड़ता है

मेडिकल जांच में हुई प्रगति के कारण अब खून से जुड़ी बीमारियों को जल्दी पहचानना और उनका इलाज करना पहले से ज्यादा आसान और प्रभावी हो गया है। बोन मैरो बायोप्सी, फ्लो साइटोमेट्री और मॉलिक्यूलर टेस्टिंग जैसी आधुनिक जांचों की मदद से हेमेटोलॉजिस्ट डॉक्टर बीमारी का सही पता लगा सकते हैं और हर मरीज के लिए अलग-अलग इलाज की योजना बना सकते हैं। इसके अलावा टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसी नई उपचार पद्धतियों से कई मरीजों को बेहतर परिणाम मिल रहे है।

मरीजों में जागरूकता होना और प्राथमिक डॉक्टर द्वारा समय पर सही विशेषज्ञ (हेमेटोलॉजिस्ट) के पास भेजना, खून से जुड़ी बीमारियों के सही इलाज के लिए बहुत जरूरी है। अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें या ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी दिखे, तो बिना देर किए हेमेटोलॉजिस्ट से सलाह लेना चाहिए। इससे बीमारी का जल्दी पता चलता है, सही इलाज शुरू होता है और मरीज के ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है।


मैक्स हेल्थकेयर के बारे में:

मैक्स हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट लिमिटेड (मैक्स हेल्थकेयर) भारत की सबसे बड़ी हेल्थकेयर संस्थाओं में से एक है। यह संस्था उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाएं और आधुनिक तकनीक व अनुसंधान के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

मैक्स हेल्थकेयर उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर कार्यरत है और 21 स्वास्थ्य सेवा केंद्र (6000 बेड्स) संचालित करता है। इसमें कंपनी और उसकी सहायक कंपनियां, साझेदारी वाले स्वास्थ्य केंद्र और प्रबंधित स्वास्थ्य सेवा केंद्र शामिल हैं। इसके नेटवर्क में दिल्ली-एनसीआर के साकेत (3 हॉस्पिटल), पटपड़गंज, वैशाली, राजेंद्र प्लेस, द्वारका, नोएडा और शालीमार बाग में अत्याधुनिक हॉस्पिटल हैं। इसके अलावा लखनऊ, मुंबई, नागपुर, मोहाली, बठिंडा, देहरादून में एक-एक हॉस्पिटल स्थित है। इसके अलावा गुरुग्राम और बुलंदशहर में सेकेंडरी केयर सेंटर और नोएडा, लाजपत नगर, पंचशील पार्क (दिल्ली-एनसीआर) और मोहाली (पंजाब) में मेडिकल सेंटर संचालित हैं। मोहाली और बठिंडा के हॉस्पिटल पंजाब सरकार के साथ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत संचालित किए जाते हैं।

इसके अलावा, मैक्स हेल्थकेयर “मैक्स@होम” और “मैक्स लैब्स” ब्रांड नाम के तहत होमकेयर और पैथोलॉजी सेवाएं भी प्रदान करता है। “मैक्स@होम” घर पर ही स्वास्थ्य और फिटनेस सेवाएं देता है, जबकि “मैक्स लैब” हॉस्पिटल के बाहर भी डायग्नोस्टिक सेवाएं प्रदान करता है।

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