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पैथोलॉजी सेवाओं में गुणवत्ता केवल योग्य विशेषज्ञ ही दे सकते हैं सही रिपोर्ट ​महाकौशल एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्ट की मांग,मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नियमों का पालन जरूरी


देवांश भारत जबलपुर। मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र में बिना योग्य विशेषज्ञों के संचालित हो रही पैथोलॉजी लैब एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं। महाकौशल एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्ट जबलपुर ने पत्रवार्ता में प्रदेश की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। राज्य के विभिन्न जिलों में वर्तमान में हजारों ऐसी लैब सक्रिय हैं जो केवल टेक्नीशियनों के भरोसे चल रही हैं। विशेषज्ञों की अनुपस्थिति में इन केंद्रों द्वारा जारी की जा रही रिपोर्ट जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा साबित हो रही हैं। स्वास्थ्य विभाग की नीतियों में एकरूपता की कमी के कारण यह अवैध जाल लगातार फैल रहा है।


लाइसेंसिंग मानकों में विरोधाभास

​एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के अलग-अलग जिलों में लैब संचालन के लिए निर्धारित लाइसेंसिंग मानक पूरी तरह भिन्न हैं। कहीं पर सर्वोच्च न्यायालय के कड़े निर्देशों का पालन हो रहा है, तो कहीं नियमों को ताक पर रखकर मात्र एमबीबीएस डिग्री धारकों को लैब रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा अपनाए जा रहे ये दोहरे मापदंड चिकित्सा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं। मानकों में इस प्रकार के अंतर के कारण ग़ैरमानक केंद्रों को संरक्षण मिल रहा है, जो सीधे तौर पर मरीजों के जीवन से खिलवाड़ है।


पैथोलॉजिस्टों की संख्या सीमा पर आपत्ति

​लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा अक्टूबर 2024 में जारी की गई एक अधिसूचना की विवादित शर्त को लेकर मामला अब मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय पहुंच गया है। इस नए नियम के अंतर्गत एक योग्य पैथोलॉजिस्ट को एक जिले में अधिकतम केवल 2 लैब तक ही सीमित कर दिया गया है। याचिकाकर्ता संगठनों ने इस प्रतिबंध को पूरी तरह मनमाना और तर्कहीन करार दिया है। उनका तर्क है कि चिकित्सा जगत के अन्य किसी भी विशेषज्ञ पर कार्यस्थलों की ऐसी कोई संख्यात्मक पाबंदी लागू नहीं है, इसलिए केवल पैथोलॉजी क्षेत्र के लिए यह नियम बनाना भेदभावपूर्ण है।

​उच्च न्यायालय ने मांगे सुझाव

पत्रवार्ता में जानकारी दी गयी कि

​माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए अवैध पैथोलॉजी लैबों को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी समस्या माना है। न्यायालय ने व्यवस्था में सुधार लाने और विसंगतियों को समाप्त करने के उद्देश्य से सभी संबंधित पक्षों और विषय विशेषज्ञों से 2 सप्ताह के भीतर लिखित सुझाव प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस कानूनी पहल का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि पैथोलॉजी सेवाओं का संचालन अनिवार्य रूप से स्नातकोत्तर योग्यता प्राप्त विशेषज्ञों जैसे MD, DNB या DCP की प्रत्यक्ष उपस्थिति और निरंतर पर्यवेक्षण में ही सुनिश्चित हो।


गुणवत्तापूर्ण जांच व प्रमाणीकरण की अनिवार्यता

​महाकौशल एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्ट ने आम नागरिकों से जागरूक होने और केवल अधिकृत केंद्रों से ही जांच कराने की अपील की है। विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के तहत कोई भी टेक्नीशियन स्वतंत्र रूप से लैब चलाने या रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने का पात्र नहीं है। सही उपचार के लिए रिपोर्ट की सटीकता और विशेषज्ञ का प्रमाणीकरण होना अत्यंत आवश्यक है। जनता को यह समझना होगा कि बिना विशेषज्ञ की देखरेख के तैयार की गई रिपोर्ट न केवल अविश्वसनीय होती है, बल्कि गलत उपचार का आधार भी बन सकती है। पत्रवार्ता में डॉ. राजेश महोबिया, डॉ. नीरज सचदेवा, डॉ. नीता भाटिया, डॉ. रितु भनोत वढेरा, डॉ. कुलदीप बजाज, डॉ. दीपाली अडगाँवकर, डॉ. शिशिर चनपुरिया और डॉ. मपरस गुप्ता की उपस्थिति रही पत्रकार वार्ता में जबलपुर के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर संजय मिश्रा की भी उपस्थित प्रशंसनीय रही।

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