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भारतीय संस्कृति और व्यवस्था को जानने देशभर से आये नौजवान


इंद्राना के जीविका आश्रम में प्रकृति और संस्कृति पर 7 दिवसीय कार्यशाला आज से शुरू।

वर्तमान समय में, प्रकृति के साथ हमारे सम्बन्ध कहीं-न-कहीं छूटते-टूटते नजर आ रहे हैं। इस अलगाव को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है, फिर भी दुर्भाग्य से इससे उभरने के रास्ते कम ही दिखाई देते हैं। इन समस्याओं के सामने खड़े होकर अपने भावों को व्यक्त करने में प्रयोग में आने वाली 'शब्दों' और 'भाषाओं' की सीमितता स्पष्ट रूप से महसूस होती है। इस विवाद का निवारण शायद हम व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि साझेदारी में, सामूहिक रूप में ही खोज पाएं।

इसी तरह का एक सामूहिक प्रयास किया जा रहा है, जीविका आश्रम में आयोजित हो रही ‘प्रकृति और संस्कृति कार्यशाला’ में। जीविका आश्रम जबलपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर इंद्राना गांव के पास स्थित है जहाँ आनंद से जीवन बिताने के तमाम साधन ग्रामीण और पारंपरिक तरीकों से उपलब्ध हैं। यह आश्रम व्यक्तिगत, पारवारिक और सामजिक जीवन में वैकल्पिक भारतीय-ग्रामीण-जीवनशैली के विभिन्न पहलुओं पर वृहत प्रयोगधर्मी पहल है। आश्रम के मूल में भारतीयता यानि भारतीय दृष्टि से ज्ञान विज्ञान, चित्त-मानस, सभ्यता-संस्कृति-परम्पराओं का बीज संकलन एवं संवर्धन की दिशा में अपनी तरह के विस्तृत अध्ययन एवं शोध का प्रयास है। तेलंगाना में स्थापित कला आश्रम से प्रेरित, यह जीविका आश्रम का संचालन 2017 से आशीष गुप्ता जी कर रहे हैं।

प्रकृति और संस्कृति पर इस तरह की पहली कार्यशाला सफलतापूर्वक इसी वर्ष अप्रैल महीने में आयोजित हुई थी। यह उस कार्यशाला का दूसरा संस्करण हैं। प्रतिभागी प्रकृतिक खेती, स्थानीय गृह-निर्माण, साहित्य और खादी जैसे कार्यों से जुड़े थे। सम्मेलन के दौरान इन्होंने आपस में और गाँव से काफी-कुछ सीखा। कार्यशाला के दौरान विभिन्न राज्यों से आये प्रतिभागी हमारे देश की समृद्ध व्यवस्था, कला, और परंपरा से जुड़ने और उन्हें समझने का प्रयास कर रहे हैं। इसके तहत वे खजूर के पत्तों से झाड़ू बनाना, पत्तल बनाना, बांस के सामन बनाना, सूत कातना, मिट्टी के दिये बनाना आदि कारीगिरी से जुड़ेंगे और इसमें उनकी मदद करने के लिए गांव के परम्परिक कारीगर अपना सहयोग देंगे। साथ ही अलग अलग मुद्दों पर संवाद करके ग्रामीण कारीगरों और कलाकारों के विशेष संदर्भ में परम्परागत सांस्कृतिक अनुभवों और आधुनिकता की तथाकथित आवश्यकताओं की खाई को पाटने का भी प्रयास किया जायेगा। गांव से नजदीकी परिचय बनाने के लिए गांव भ्रमण, जंगल भ्रमण, नदी भ्रमण, गणेश विसर्जन दर्शन, शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम आदि को भी शामिल किया गया है ताकि चर्चा बौद्धिक मात्र ना होकर व्यावहारिक बन सके।

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