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डायबिटीज और किडनी: जानिए इस ‘साइलेंट’ खतरे से कैसे बचें डॉ. पंकज जावंधीया - वरिष्ठ सलाहकार – नेफ्रोलॉजी (किडनी रोग विशेषज्ञ), मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नागपुर


देवांश भारत। आज दुनिया की 'डायबिटीज की राजधानी' बनता जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, करोड़ो भारतीय इस बीमारी के साथ जी रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं की डायबिटीज का सबसे बुरा असर हमारी किडनी पर है तो पड़ता है। हर तीन में से एक डायबिटीज मरीज को किडनी की बीमारी होने का खतरा होता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है की किडनी की बीमारी की शुरुआत में कोई दर्द या संकेत नहीं देती—यह एक 'खामोश' खतरा है। ऐसा डॉ.पंकज जावंधीया-वरिष्ठ सलाहकार–नेफ्रोलॉजी (किडनी रोग विशेषज्ञ),मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल,नागपुर ने बताया ।


लेकिन चिंता की बात केवल बढ़ती डायबिटीज नहीं है। असली खतरा उन गंभीर जटिलताओं का है, जो धीरे-धीरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाला अंग है — किडनी।


डॉ.पंकज जावंधीया-वरिष्ठ सलाहकार–नेफ्रोलॉजी (किडनी रोग विशेषज्ञ),मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल,नागपुर ने आगे बताया की,बहुत से लोग यह नहीं जानते कि लंबे समय तक अनियंत्रित शुगर हमारी किडनी की महीन रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। यही कारण है कि डायबिटीज मरीज को भविष्य में किडनी रोग होने का खतरा रहता है। समस्या यह है कि किडनी की बीमारी शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देती। न दर्द होता है, न कमजोरी का कोई खास संकेत दिखाई देता है। इसलिए इसे एक “खामोश खतरा” कहा जाता है।


डायबिटीज किडनी को कैसे नुकसान पहुंचाती है?

हमारी किडनी शरीर का प्राकृतिक फिल्टर है। यह खून को साफ करती है, शरीर से अतिरिक्त पानी और विषैले तत्व बाहर निकालती है तथा शरीर में नमक और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखती है।


जब लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ी रहती है, तो किडनी की फिल्टर करने वाली छोटी-छोटी नसें प्रभावित होने लगती हैं। धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता कम होने लगती है। यदि समय पर ध्यान न दिया जाए, तो स्थिति इतनी गंभीर हो सकती है कि मरीज को डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की आवश्यकता पड़ सकती है।


डायबिटीज के कारण होने वाली किडनी बीमारी को डायबिटिक नेफ्रोपैथी कहा जाता है। यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और कई वर्षों तक बिना लक्षण के रह सकती है।


किडनी को बचाने के 5 अचूक उपाय :


शुगर और बीपी का नियंत्रण - अपनी HbA1c को 7% से नीचे रखें और ब्लड प्रेशर को 130/80 के करीब बनाये रखें। हाई बीपी किडनी की नसों को नुकसान पहुंचाता है


आहार में बदलाव : नमक का सेवन कम करें (दिन भर में 1 चम्मच से कम)। सफेद चावल और मैदा की जगह मोटा अनाज ( मिल्लेट्स ) शामिल करें।


पेनकलसर्स से तौबा : बिना डॉक्टर की सलाह के ददर्द नवारक दवाएं (जैसे आईबिुप्रोफेन) न लें, ये किडनी के लिए जहरीली हो सकती हैं।


नियमित व्यायाम और पानी: रोज 30 मिनट चले और शरीर को हाइड्रेटेड रखें। यह टॉक्सन्स को बाहर निकलने में मदद करता है।


सालाना जांच (Screening): साल में एक बार 'Urine ACR' और 'eGFR' टेस्ट जरूर करवाएं। यह टेस्ट बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ लेते हैं।

हालांकि शुरुआती चरण में बीमारी अक्सर बिना लक्षण की होती है, फिर भी कुछ संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है , पैरों या चेहरे पर सूजन, बार-बार पेशाब आना, विशेषकर रात में , कमजोरी और थकान , भूख कम लगना , सांस फूलना , पेशाब में झाग आना , ब्लड प्रेशर का लगातार बढ़ना . यदि इनमें से कोई भी समस्या दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।


किडनी की सुरक्षा का सबसे बड़ा मंत्र है— 'इंतजार न करें, जांच करवाएं'। यदि हम समय पर जागरूक हो जाएं, तो दवाओं और सही जीवनशैली से हम डायलसस की नौबित आने से खुद को बचा सकते हैं। अपनी किडनी का सम्मान करें, वे आपके जीवन का आधार हैं।


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