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एमिटी यूनिवर्सिटी में पीएचडी शोध छात्रों की परेशानी बढ़ी, यूजीसी मानकों के नाम पर उत्पीड़न का आरोप

देवांश भारत ग्वालियर। एमिटी यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे शोध छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के मापदंडों से अलग अपनी नीति और नियमों का हवाला देकर उन्हें लगातार परेशान करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। शोध छात्रों का कहना है कि प्रवेश के समय उन्हें यह स्पष्ट आश्वासन दिया गया था कि पीएचडी की डिग्री अधिकतम 3.5 से 4 वर्षों के भीतर प्रदान कर दी जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है।


शोध छात्रों के अनुसार वर्ष 2019 में प्रवेश लेने वाले कई विद्यार्थियों को अब तक डिग्री प्रदान नहीं की गई है। आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें स्कोपस इंडेक्स प्रकाशन (Publication) की शर्तों के नाम पर अनावश्यक रूप से उलझा रहा है, जबकि इसके बदले उनसे भारी-भरकम शुल्क भी वसूला जा रहा है। छात्रों का कहना है कि हर साल नए-नए नियम लागू कर दिए जाते हैं, जिससे उनकी शोध प्रक्रिया लगातार लंबित होती जा रही है।


छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में गाइड (शोध निर्देशक) बार-बार बदले जाते हैं, जिससे शोध की निरंतरता प्रभावित होती है। गाइड परिवर्तन के कारण शोध विषय, कार्यप्रणाली और प्रकाशन से संबंधित प्रक्रियाओं में बार-बार बदलाव करना पड़ता है, जिससे मानसिक, शैक्षणिक और आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।


पीड़ित शोध छात्रों का कहना है कि इन परिस्थितियों के कारण न केवल उनका समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि भविष्य भी अनिश्चितता के दौर में चला गया है। उन्होंने संबंधित शैक्षणिक एवं नियामक संस्थाओं से मामले में हस्तक्षेप कर न्याय दिलाने की मांग की है।

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