हाईकोर्ट के आदेश पर दो साल बाद जागे सीएमएचओ, याचिकाकर्ता को सौंपे पदीय दायित्व
देवांश भारत जबलपुर। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने प्रवीण सोनी बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य के मामले में दायर रिट याचिका (Writ Petition No. 24489/2024) में 29 अगस्त 2024 को याचिकाकर्ता को बड़ी राहत देते हुए अंतरिम निर्देश दिया था कि उन्हें सुनवाई की अगली तारीख तक सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाए।
इससे पूर्व, 22 जनवरी 2020 को याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी किया गया था, जिसे उच्च न्यायालय ने रिट याचिका (WP No. 2876/2020) में निरस्त (Quashed) करते हुए कहा था कि अधिकारियों को याचिकाकर्ता को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना चाहिए। न्यायालय ने पाया था कि कर्मचारी की सेवा समाप्त करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं एवं नियमों का पालन नहीं किया गया था।
इसके बावजूद, संबंधित अधिकारियों ने पुनः सेवा समाप्ति का आदेश पारित कर दिया, जबकि इस बार भी कोई नियमित विभागीय जांच नहीं की गई थी। इसके विरुद्ध दायर प्रकरण में उच्च न्यायालय ने 10 मई 2024 को एक अन्य आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता को विभागीय अपील प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। साथ ही यह भी निर्देशित किया था कि अपील का निर्णय होने तक याचिकाकर्ता सेवा में कार्यरत बने रहेंगे।
इसके पश्चात विभागीय अपील पर कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता को पुनः जिला कम्युनिटी मोबिलाइजर (D.C.M.) के पद से हटा दिया गया। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में पुनः याचिका दायर की। इस पर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को पूर्व में भी अंतरिम संरक्षण प्रदान किया गया था, जिसके अंतर्गत वे अगस्त 2024 तक लगातार सेवा में बने हुए थे। न्यायमूर्ति विवेक जैन की पीठ ने स्पष्ट अंतरिम निर्देश देते हुए याचिकाकर्ता को सेवा में निरंतर बनाए रखने का आदेश दिया था।
उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के बावजूद, विगत लगभग दो वर्षों से तत्कालीन सीएमएचओ द्वारा याचिकाकर्ता को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की गाइडलाइन के अनुसार जिला कम्युनिटी मोबिलाइजर के पद हेतु निर्धारित दायित्वों के निर्वहन का आदेश जारी नहीं किया गया था।
अब लगभग दो वर्ष बाद नवनियुक्त सीएमएचओ डॉ. नवीन कोठारी ने प्रवीण सोनी को जिला स्तर पर शहरी आशा कार्यकर्ताओं से संबंधित समस्त कार्यों के संपादन का दायित्व सौंपने का आदेश जारी किया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि उच्च न्यायालय के अंतरिम निर्देशों के अनुरूप पदीय दायित्व सौंपने में लगभग दो वर्षों का विलंब क्यों हुआ? साथ ही, इस अवधि में याचिकाकर्ता को निर्धारित पदीय कार्य सौंपे बिना वेतन का भुगतान किए जाने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही कैसे तय की जाएगी और उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होगी?





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